उद्योगपर्व — महाभारत के अठारह पर्वों के इस मौलिक संक्षिप्त गद्य पुनर्कथन में भाग 1/2।
युद्ध की आशंका बढ़ने पर दोनों पक्ष मित्र राजाओं को साथ लेते हैं। कृष्ण उचित समझौते के लिए कौरव सभा में शान्ति-दूत बनकर जाते हैं, पर दुर्योधन छोटा-सा अधिकार देना भी स्वीकार नहीं करता। वार्ता का असफल होना दिखाता है कि अहंकार विवेक को दबा सकता है। दोनों पक्षों के व्यक्तियों के सामने निष्ठा और धर्म के कठिन प्रश्न आते हैं।
नैतिक जटिलता और दुखद परिणामों सहित संपूर्ण कथाक्रम समझने के लिए अन्य पर्व भी क्रम से पढ़ें।
