अयोध्याकाण्ड — 3 में से भाग 3। यह परंपरागत रामकथा का मौलिक गद्य पुनर्कथन है; मूल श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं।
भरत अयोध्या लौटकर छल से मिला राज्य स्वीकार नहीं करते और राम से मिलने जाते हैं। वे बड़े भाई से लौटने की प्रार्थना करते हैं, लेकिन राम पिता का वचन तोड़ने से इनकार कर देते हैं। भरत राम की पादुकाएँ लेकर नंदीग्राम लौटते हैं और वनवास की अवधि तक राज्य की देखरेख करते हैं। पादुकाएँ सत्ता को निजी अधिकार नहीं, सेवा का दायित्व मानने का प्रतीक बनती हैं।
यह प्रसंग धर्म, करुणा और निर्णयों के परिणाम पर विचार करने की प्रेरणा देता है। संपूर्ण कथा का क्रम समझने के लिए काण्ड के अगले अध्याय भी पढ़ें।
